बैगा जनजातियों द्वारा गंगा दशहरा/दशमी में किऐ जाने वाली क्रियाएं गंगा दशहरा- जन्म नाल एवं कमल नाल का सम्बन्ध
जो लोग कहते है जनजाति हिंदू नहीं हैं उनके लिए.........
बैगा जनजातियों द्वारा गंगा दशहरा/दशमी में किऐ जाने वाली क्रियाएं
गंगा दशहरा- जन्म नाल एवं कमल नाल का सम्बन्ध
बैगा जनजातियों में गंगा दशहरा का पर्व धूम-धाम से मनाया जाता है। बैगा जनजाति की मान्यता है कि गंगा दशहरे के दिन पुरइन (कमल) के पत्ते से युक्त जलाशय में गंगा विराजती हैं। इसलिए इसी जलाशय को गंगा तुल्य मानकर इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। गंगा दशहरे के दिन किसी स्थानीय जलाशय में, साल भर आयोजित शुभ कार्यों से सम्बंधित सामान जैसे- विवाह का मौर, कक्कन, कलश, बच्चे के जन्म के समय का नाल व छटठी का बाल आदि को विसर्जित किया जाता है।
इस दिन बैगा (पुरोहित) पूजा-अर्चना करवाता है। गंगा पूजन नारियल, सुपारी, फल-फूल और अगरबत्ती से किया जाता है। विवाह के मौर, कक्कन एवं बच्चे के जन्म नाल को कमल की जड़ में गाड़ने की परम्परा है।
गंगा दशहरे के दिन, दान का विशेष महत्व है इसलिए विसर्जित करने जाने के पूर्व गांव में सगे-संबधियों को निमंत्रित कर उन्हें तेल, कपड़ा, रोटी और यथाशक्ति रूपये दान देकर दशहरा मेला देखने जाने के लिए कहा जाता है। जलाशय में पुरइन (कमल) की जड़ के नीचे, बच्चे के जन्म के समय की नाल को गाड़ा जाता है। यह कार्य गांव का बैगा, पूजा करवाकर करता है। घर का जो व्यक्ति विसर्जित करने जाता है, वह उपवास रखता है। विसर्जित कर घर लौटने पर संगे-सबंधियों को भोज पर आमंत्रित किया जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि ‘हम लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों के चीजों को गंगा में सेराना (विसर्जित करना) पुण्य मानते हैं किन्तु गंगा दूर है इसलिए किसी भी जलाशय को गंगा तुल्य मानकर, पूजा-अर्चना कर, शुभ कार्यों के सामान को विसर्जित कर पुण्य लाभ लेते हैं।
आप सभी को गंगा दशहरा (गंगा दशमी) की अनंत शुभकामनाएं
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