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फोरमैन के अथक प्रयास से समर्सिबल चालू हुआ SECL JAMUNA KOTMA AREA


फोरमैन के अथक प्रयास से समर्सिबल चालू हुआ
 जमुना बदरा आज लगभग 20 दिन बाद बोरहूल में समर्सिबल चालू हुआ है यह कोई पहली घटना नहीं है पिछले वर्ष लगभग इसी गर्मी के सीजन में 1 माह बाद समर्सिबल चालू हुआ था लोग पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहे थे आज भी वही स्थिति है श्रमिक नगर कॉलोनी में आज लगभग 4 माह से पेयजल बाधित है और प्रबंधन वर्ग कान में तेल डालकर सो रहा है प्रबंधन की उदासीनता इतनी बढ़ गई है कि उसे श्रमिक की समस्या से कोई मतलब ही नहीं है 
         बदरा सब एरिया में सिर्फ बदरा में एक फोरमैन है जो इधर पर पेयजल सप्लाई को भी देखते है उधर बिजली विभाग के मेंटेनेंस को भी देखते है आखिर एक व्यक्ति कितना कार्य को देखेगा, और करेगा । आज फोरमैन के अथक प्रयास से ही समर्सिबल चालू हो सका है, अगर लक्ष्मीकांत तिवारी इस विभाग के फोरमैन ना होते तो शायद ही लोगों को पीने का पानी मिल पाता । यही व्यक्ति एक एक अधिकारी से विनती कर करके एक एक नट बोल्ट मांग कर किसी तरह से विभाग को जिंदा करके रखा हुआ है वरना मैनेजमेंट तो कब का पेयजल वितरण विभाग को बंद कर दिया होता , इन्हीं के प्रयासों से आज भी थोड़ा बहुत पेयजल सप्लाई हो जा रहा है वरना मैनेजमेंट तो इस विभाग को कब का बंद कर चुका होता फोरमैन के अथक प्रयास के बाद भी श्रमिक नगर में पेयजल चालू नहीं हो सका है, एक जानकारी में यह भी पता चला है कि पहले मेंटेनेंस के लिए प्रबंधन द्वारा प्रतिमाह ₹3000 दिया जाता रहा है शायद अब प्रबंधन उसे भी बंद कर दिया है कोई भी आदमी अपने जेब का पैसा खर्च कर मरम्मत नहीं करवाएगा । फोरमैन को एक एक नट बोल्ट के लिए इस स्टोर से उस स्टोर का चक्कर काटना पड़ता है इस परेशानी को मैनेजमेंट क्या जाने इसे तो फोरमैन को ही झेलना पड़ता है 
       सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार एक यूनियन लीडर ने बताया है कि आज सभी यूनियन के लोग परेशान हैं प्रबंधन किसी भी हालत में हमारी बातें नहीं सुन रहा है और ना ही हमारी कोई बात मानी जा रही है हमें अपनी बात को मनवाने के लिए मोहाडा पर खड़े होकर खदान को बंद करवाना पड़ता है तब कहीं जाकर मैनेजमेंट हमारी बात सुनता है वरना यहां कोई किसी का सुनने वाला नहीं है इन बातों से एक बात साफ समझ में आती है कि मैनेजमेंट के निगाह में श्रमिकों की समस्याएं गौड हो चुकी है और मैनेजमेंट तानाशाह हो गई है। ये कैसा वक्त आ गया है क्या श्रमिकों को खदान बंद करने के बाद ही उनकी समस्याओं को सुना जाएगा क्या अब एकमात्र विकल्प यही बचा है आखिर श्रमिक अपनी समस्या को लेकर किसके पास जाए "जब बहारें ही चमन को जलाने लगे तो फिजाओं का फिर क्या काम है" एक अजीब सी स्थिति निर्मित हो चुकी है जो पालक है वही सजा देने पर आमादा है 
        जमुना कोतमा क्षेत्र के मानवीय संवेदना को समझने वाले न्याय प्रिय महाप्रबंधक जी से बदरा कालरी के श्रमिकों की विनती है कि इस भीषण गर्मी में कुछ दे या ना दे पानी तो दे ही दे।

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