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रामायण में भी हुआ था विश्व की 500 नदियों के जल से भगवान् श्रीराम का अभिषेक

रामायण में भी हुआ था विश्व की 500 नदियों के जल से भगवान् श्रीराम का अभिषेक

कितनी ही सदियों के बाद दुनिया भर की नदियों और समुद्रों का जल अयोध्या में भगवान श्री रामचन्द्र के अभिषेक के लिए लाया गया है।
जब भगवान् श्री राम का राज्याभिषेक हुआ था, तब भी विश्व की चारों दिशाओं के समुद्रों और दुनिया भर की 500 नदियों का जल इसी तरह कलशों में भरकर लाया गया था। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के 128वें सर्ग में बताया गया है कि कैसे भरत जी ने यह योजना बनाई, सुग्रीव ने इसे और बड़ा रूप दिया, और हनुमान जी और जाम्बवन्त आदि सभी वानरों और सेना ने इस कार्य को सम्पन्न किया था।

आइए पढ़िए, कैसे यह शुभकार्य रामायण में सम्पन्न हुआ था।

जब भगवान श्री राम का राज्याभिषेक हुआ था, तब भी विश्व की चारों दिशाओं के समुद्रों और नदियों का जल इसी तरह कलशों में भरकर लाया गया था। वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के 128वें सर्ग में बताया गया है कि कैसे भरत जी ने यह योजना बनाई, सुग्रीव ने इसे और बड़ा रूप दिया, और हनुमान जी और जाम्बवन्त आदि सभी वानरों और सेना ने इसे अंजाम दिया।

"भरत जी ने बनाई दुनिया भर के समुद्रों और नदियों से जल लाने की योजना"

उवाच च महातेजाः सुग्रीवं राघवानुजः।
अभिषेकाय रामस्य दूतानाज्ञापय प्रभो॥४८॥

भगवान श्री राम के राज्याभिषेक के समय भरत ने सुग्रीव से कहा, प्रभो! भगवान् श्रीराम के अभिषेक के लिए जल लाने हेतु आप अपने दूतों को आज्ञा दीजिए।

सौवर्णान् वानरेन्द्राणां चतुर्णां चतुरो घटान्।
ददौ क्षिप्रं स सुग्रीवः सर्वरत्नविभूषितान् ॥४९॥

तब सुग्रीव ने उसी समय चार श्रेष्ठ वानरों को सब प्रकार के रत्नों से मढ़े हुए चार सोने के घड़े देकर कहा –

तथा प्रत्यूषसमये चतुर्णां सागराम्भसाम् ।
पूर्णैर्घटैः प्रतीक्षध्वं तथा कुरुत वानराः ॥ ५० ॥

वानरों! तुम लोग कल सुबह ही विश्व की चारों दिशाओं के समुद्रों के जल से इन घड़ों को भरकर लाओ और अगले आदेश की प्रतीक्षा करो।

एवमुक्ता महात्मानो वानरा वारणोपमाः ।
उत्पेतुर्गगनं शीघ्रं गरुडा इव शीघ्रगाः ॥ ५१ ॥

सुग्रीव के इस आदेश पर हाथी के समान विशालकाय वो महात्मा वानर, जो गरुड़ के समान तेजी से उड़ते थे, उसी समय आकाश में उड़ चले।

चार दिशाओं के समुद्रों के साथ साथ विश्व की 500 नदियों से लाया गया जल
जाम्बवांश्च हनूमांश्च वेगदर्शी च वानरः ।
ऋषभश्चैव कलशांजलपूर्णानथानयन्॥५२॥
नदीशतानां पञ्चानां जलं कुम्भैरुपाहरन् ।

जाम्बवान्, हनुमान, वेगदर्शी (गवय) और ऋषभ— ये सभी वानर चारों समुद्रों से और विश्व की पाँच सौ नदियों से भी सोने के बहुत से कलशों में जल भर लाए।

रामायण में यह भी बताया गया है कि कौनसी दिशा के समुद्र और नदियों से कौन श्रीराम के अभिषेक के लिए जल भरकर लाया,

पूर्वात् समुद्रात् कलशं जलपूर्णमथानयत् ॥ ५३ ॥
सुषेणः सत्त्वसम्पन्नः सर्वरत्नविभूषितम् ।

जिनके पास रीछों की बहुत-सी सुन्दर सेना थी, ऐसे शक्तिशाली जाम्बवान् बहुत सारे रत्नों से सजे हुए सोने के कलश लेकर गये और उसमें पूर्व दिशा के समुद्र का जल भरकर ले आए।

ऋषभो दक्षिणात्तूर्णं समुद्राज्जलमानयत् ॥ ५४ ।।
रक्तचन्दनकर्पूरैः संवृतं काञ्चनं घटम् ।

ऋषभ दक्षिण दिशा के समुद्र से शीघ्र ही एक सोने का घड़ा भर लाए। वह कलश लाल चन्दन और कपूर से ढका हुआ था।

गवयः पश्चिमात् तोयमाजहार महार्णवात् ॥ ५५ ॥
रत्नकुम्भेन महता शीतं मारुतविक्रमः ।

वायु के समान वेगवान गवय एक रत्ननिर्मित विशाल कलश के द्वारा पश्चिम दिशा के महासमुद्र से शीतल जल भरकर लाए

उत्तराच्च जलं शीघ्रं गरुडानिलविक्रमः ॥ ५६ ॥
आजहार स धर्मात्मानिलः सर्वगुणान्वितः ।

गरुड़ तथा वायु के समान तेज गति से चलने वाले, धर्मात्मा और सर्वगुणसम्पन्न महाभागवत पवनपुत्र हनुमान भी उत्तर दिशा के महासागर से शीघ्र ही जल ले आए।

ततस्तैर्वानरश्रेष्ठैरानीतं प्रेक्ष्य तज्जलम्॥५७॥
अभिषेकाय रामस्य शत्रुघ्नः सचिवैः सह।
पुरोहिताय श्रेष्ठाय सुहृद्भ्यश्च न्यवेदयत्॥५८॥

उन वानरों के द्वारा लाए गए उस जल को देख शत्रुघ्न ने अपने मंत्रियों के साथ वह सारा जल श्रीराम के अभिषेक के लिये पुरोहित महर्षि वशिष्ठ आदि को समर्पित कर दिया।

इसके बाद जैसे आठ वसुओं ने इन्द्र का अभिषेक किया था, उसी तरह महर्षि वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, कात्यायन, सुयज्ञ, गौतम और विजय, इन आठ मंत्रियों ने उन विश्व भर के स्वच्छ और पवित्र जल से श्रीराम और माँ सीता का अभिषेक किया।

हजारों साल बाद दोहराया जा रहा इतिहास
कितनी ही सदियों के बाद दुनिया भर की नदियों और समुद्रों का जल अयोध्या में भगवान श्री रामचन्द्र के अभिषेक के लिए लाया गया है। इससे पहले 2021 में श्रीरामजन्मभूमि पूजन के समय भी दुनिया के 115 देशों से अयोध्या में जल लाया गया था, इस बार 155 देशों की नदियों से जल लाया गया है।

हालाँकि कुछ कट्टरपंथी लोगों ने इसे राजनीतिक तमाशा कहकर विरोध किया था, पर शायद उन्होंने रामायण नहीं पढ़ी थी, कि यह पहली बार नहीं है कि पूरे विश्व के राजा रामचन्द्र का पूरे विश्व की नदियों से अभिषेक हो। पर हाँ हजारों साल बाद जरुर है।


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