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1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस , वह परिवर्तन का रास्ता सिर्फ हमें मार्क्सवाद ही दे सकता है - निशा मिश्रा CPI

1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस , वह परिवर्तन का रास्ता सिर्फ हमें मार्क्सवाद ही दे सकता है - निशा मिश्रा
 मजदूरों की  नेत्री  एरिया वेलफेयर बोर्ड सदस्य एसईसीएल जमुना कोतमा क्षेत्र
जब हम मजदूरों की बात करते हैं तो इसका सीधा मतलब है कि हमें मजदूर वर्ग को परिभाषित करना होगा मोटे तौर पर वह मानव जो अपने श्रम के बदले लाभ अर्जित करता है वह श्रमिक अर्थात मजदूर कहलाता है ।उसकी शक्लें अलग-अलग हो सकती हैं वह खेत मजदूर के रुप में ,कल कारखाने के मजदूर के रूप में, डॉक्टर ,वकील, प्रोफेसर या किसी तकनीक के अभियंता के रूप में कार्य करता हो लेकिन उसके धन उपार्जन का जरिया सिर्फ श्रम होता है वह उस वर्ग से अलहदा होता है जो दूसरों के श्रम पर उसके उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त लाभ प्राप्त करते हैं।
लेकिन इस वर्ग का शोषण मानव सभ्यता के क्रमिक विकास के साथ ही प्रारंभ हो गया था समय-समय पर अलग-अलग पृथ्वी के हिस्से में श्रमिकों ने अपने श्रम और शोषण के विरुद्ध आवाजे उठाना प्रारंभ कर दिया था। किंतु यह एक संगठित आंदोलन के रूप में जब अपनी आवाज काम के 8 घंटे आराम के 8 घंटे और मनोरंजन और अध्ययन के 8 घंटे 8 घंटे के कार्य दिवस की इस प्रकार की मांग एक युवा अमेरिकी मजदूर संगठन अमेरिकी मजदूर फेडरेशन ने सबसे पहले सूचीबद्ध की थी उन लोगों ने 7 अक्टूबर अट्ठारह सौ चौरासी को एक प्रस्ताव के जरिए यह मानती कि 1 मई 18 से 86 से 8 घंटे का कार्य दिवस एक कानून के जरिए विधि सम्मत ढंग से शुरू किया जाए 1 मई 18 से 86 की हड़ताल में 3:30 लाख मजदूरों ने भाग लिया जिसका मुख्य केंद्र अमेरिका का शहर शिकागो था जहां यूनियनों में वामपंथी प्रभाव मजबूत था लगभग 185000 मजदूरों ने विशेष रूप से जो निर्माण कार्य संबंधी रोजगार में लगे हुए थे 8 घंटे के कार दिवस की मांग जीत ली इस हड़ताल का मजदूर आंदोलन को आगे बढ़ाने में अकूत प्रभाव पड़ा था अनेक यूनियनों का जन्म इसी संघर्ष के प्रारंभ के साथ हुआ है इसने अमेरिकी श्रम फेडरेशन का बढ़ाओ उस भीषण संघर्ष में सुनिश्चित कर दिया जो उन दिनों इस संगठन आश्रम के सरदारों के बीच हो रहा था महान संघर्ष के अंतर्राष्ट्रीय मई दिवस का भी जन्म हुआ जिस दिन 18 सो 89 में पेरिस में दूसरे इंटरनेशनल के की स्थापना के लिए कांग्रेश आयोजित हुई थी उसी दिन को विश्व के श्रमिकों के त्योहार के रूप में मान्यता दी गई श्रमिकों ने 8 घंटे काम के 8 घंटे आराम के 8 घंटे मनोरंजन के नारे को बुलंद किया तो दुनिया के हर हिस्से में मजदूरों की एकता की बात सामने आने लगी और महान दार्शनिक कार्ल मार्क्स ने जब यह कहा कि दुनिया के इतिहास को बदल करके एक शोषण मुक्त अर्थव्यवस्था पर आधारित राज्य कायम करने की एक ही शर्त है कि दुनिया के मजदूरों को एक होना पड़ेगा और इसीलिए यह एक आदर्श नारा "दुनिया के मजदूरों एक हो" कार्ल मार्क्स का जीवंत नारा बन गया !
और आज समूची दुनिया में 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मजदूरों के उत्सव और त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा और यह बाध्यता सिर्फ समाजवादी रास्तों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि पूंजीवादी देशों में भी जब इसका अंतरराष्ट्रीय करण किया गया तो उनकी भी बाध्यता मजदूर दिवस मनाने की हो गई जब हम अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के जन्म के इतिहास को खेलते हैं तो मई दिवस के 3 जयंती यों का प्रत्येक हमारे सामने उपस्थित होता है सबसे पहली जयंती अट्ठारह सौ छियासी कि वो तारीखें हैं जिन दिनों अमेरिका में श्रमिकों ने 8 घंटे के कार्य दिवस के लिए अभियान चलाया था और अभियान तब अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया जब शिकागो में श्रमिकों पर गोलियां चलाई गई दूसरी जयंती 1888 की है जब दूसरा इंटरनेशनल कि कांग्रेस ने फैसला किया कि हर वर्ष 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक एकजुटता दिवस के रुप में मनाया जाए और तीसरी जयंती 1890 की है जब उक्त फैसले के अनुसरण में अनेक देशों में पहले पहल मई दिवस समारोह मनाए गए।
जुझारू श्रमिक परंपराओं ने श्रमिकों के आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों के लिए उनके संघर्ष में हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है और अब भी वह निसंदेह अपनी विराट भूमिका अदा करते चले आ रहे हैं जिन घटनाओं ने मई दिवस की परंपरा को शुरू किया उनकी शताब्दी ने अंतरराष्ट्रीय श्रमजीवी वर्ग संघर्ष के इस प्रमुख स्वरूप के उद्गम में करोड़ों श्रमजीवी लोगों के मन में एक गहरी दिलचस्पी उत्पन्न की है किंतु उनकी दिलचस्पी मात्र इतिहासिक नहीं है इसके समकालीन कारण भी है इसका एक कारण यह भी है कि उच्च विकसित पूंजीवादी देशों सहित अनेक पूंजीवादी देशों में मजदूरों के आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों पर धन्ना सेठों द्वारा बराबर प्रहार किया जाता रहा यह निर्विवाद है कि संसार में इन 137वर्षों में भारी परिवर्तन हुए हैं ,सामाजिक और राजनीतिक ताकतों के आपसी संबंध बिल्कुल भिन्न है और वर्ग संघर्ष विभिन्न स्थितियों में लड़ा जा रहा है फिर भी बहुत सा इतिहासिक अनुभव  आज भी अत्यंत संगत है।
जब हम मजदूर वर्ग की बात करते हैं और उसके शोषण की बात करते हैं तो सबसे पहला प्रश्न हमारे मस्तिष्क में यही उठता है कि श्रम क्या है और उसका शोषण कैसे होता है इसकी खोज अर्थशास्त्र में अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत में कार्ल मार्क्स ने किया था।
दुनिया में कार्ल मार्क्स पहला वह वैज्ञानिक दार्शनिक हुआ, जिसने अपने पूर्वर्ती दार्शनिकों के तरह दुनिया कैसे बनी इसकी व्याख्या के साथ-साथ दुनिया को कैसे बदला जाए उसके राजनीतिक और आर्थिक अवतार समाज के सामने पेश किया  कार्ल मार्क्स इसलिए सबसे महानतम जीवित विचारक थे कि केवल उन्हीं के दर्शन ने न केवल विश्व की व्याख्या की बल्कि यह भी बताया कि उसे किस प्रकार बदला जाए यही वह बिंदु है जहां से मार्क्सवाद अन्य सभी चिंतन प्रणालियों से अलग हटता है यही बात मार्क्सवाद को क्रांतिकारी दार्शनिक  बना देती है निसंदेह इसका अर्थ सिद्धांत और व्यवहार की एकता भी है क्योंकि आप दुनिया को तभी बदल सकते हैं जब आप उस प्रक्रिया को समझने जिससे विश्व का निर्माण हुआ हो इसमें कोई शक नहीं है कि एक सतत जारी रहने वाली प्रक्रिया है किसी भी निश्चित क्षण में हमारा ज्ञान पूर्ण भी है और अधूरा दोनों ही और यह जो हमारा ज्ञान गहरा होता जाता है उसी प्रकार उस प्रक्रिया में पारंगत हासिल होती है जिससे परिवर्तन लाया जाता है।
सामाजिक राजनीतिक परिस्थिति की व्याख्या करते हुए यह स्थापित किया गया की जब उत्पादन के साधन पर सामाजिक स्वामित्व होता है तभी शोषण को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है यह सरल नहीं है प्रत्येक देश अपने रास्ते से समाजवाद की ओर बढ़ेगा पर इसकी मुख्य कसौटी यानी उत्पादन साधनों पर सामाजिक स्वामित्व का पालन करता रहेगा जैसा कि हम जानते हैं राज्य उत्पीड़न का यंत्र है यह अल्पसंख्यक शासकों का बहुसंख्यक शासकों पर शासन करने और उनका शोषण करने में मदद करता है इसलिए लेनिन ने कहा था की "क्रांति का अर्थ है एक वर्ग से दूसरे वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन" सभी लोग अवश्यंभावी रूप से राज्य को अपने वर्ग के  शासकों के शासन के औजार में रूपांतरित कर देते हैं।
 अतः जब तक शोषक रहेंगे जो बहुसंख्यक लोगों पर शासन करते हैं तो वह जनतांत्रिक राज्य निसंदेह शोसकों के लिए जनतंत्र रहेगा।
 शोषितों का राज्य अवश्य ऐसे राज्य से मौलिक रूप से भिन्न होगा यह अवश्य ही शोषकों का जनतंत्र होगा ।
आज तीसरी दुनिया के कई देश पूंजीवाद के उस रास्ते की तरफ बढ़ चले हैं जहां पर सार्वजनिक संस्थानों को नष्ट करके निजी हाथों में उन्हें सौंपा जा रहा है जिससे राज्य की मेहनतकश जनता को राज्य के श्रम से उपार्जित लाभ का हिस्सा प्राप्त नहीं होता बल्कि उसका अतिरिक्त मूल्य किसी एक उद्योगपति की जेब में जाता है जिससे मजदूर वर्ग जरूरत से ज्यादा शोषित होता है और भौतिक संसाधनों का उपयोग और उपभोग से वह वंचित रहता है तमाम राष्ट्रों ने जब उपनिवेश गुलामी से मुक्ति का मार्ग अपनाया तो उन्होंने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ राज्य का संचालन किया श्रमिक कानूनों का निर्माण किया गया लेकिन श्रमिकों के शोषण के पूर्व खात्मा के लिए ज्यादातर पूंजीवादी सरकारों ने कोई प्रयास नहीं किया इसके ही समानांतर समाजवादी मुल्कों ने शोषण मुक्त व्यवस्था को कायम करने में अपनी अहम भूमिका का निर्वाह किया जब हम अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की बात करते हैं तो हमें उस और निगाहे डालनी पड़ेगी कि देश के हिस्से का एक बड़ा वर्ग जो सड़कों में कल कारखानों में खेतों में खदानों में दफ्तरों में घरों में लगातार अपने श्रम से एक खूबसूरत दुनिया का निर्माण सदियों से करता चला रहा है लेकिन उसकी निजी जिंदगी में अंधेरे के अलावा रोशनी की कोई एक किरण नजर नहीं आती यह जो श्रमिक वर्ग है यही वह वर्ग है जिसके हाथ में सत्ता होनी चाहिए और मार्क्सवादी एक ऐसा रास्ता है जो हमको यह बतलाता है कि जब मजदूरों की सत्ता होगी तो तमाम किस्म के भौतिक संसाधन पर समाज के संपूर्ण नागरिक समाज का कुआं हिस्सा होगा लेकिन इससे अलग पूंजीवादी समाज में मुट्ठी भर लोगों के पास संपूर्ण संसाधन और दुनिया के ऐसो आराम है और 90% से ज्यादा आबादी आज भी कंगाली भुखमरी और शोषण के शिकंजे में फंसी तड़पा रही है इन तमाम विसंगति पूर्ण परिस्थितियों को बदलने के लिए आज भी दुनिया के अलग अलग अलग अलग हिस्सों में मजदूर आंदोलन तेज किए जा रहे हैं और आज 1 मई जब हम अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाने जा रहे हैं तो हमें इस बात को समझना होगा कि शोषण मुक्त राजनीतिक सामाजिक अर्थव्यवस्था को कायम करने के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है और वह परिवर्तन का रास्ता सिर्फ हमें मार्क्सवाद ही दे सकता है।
निशा मिश्रा मजदूरों की  नेत्री  एरिया वेलफेयर बोर्ड सदस्य एसईसीएल जमुना कोतमा क्षेत्र

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