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चुनाव की पगचाप के साथ जुमलों की बरसात शुरू - अनिल शर्मा


 

🔴 जैसे जैसे विधानसभा चुनावों की तारीख करीब आ रही है, हुक्मरानो में घबराहट बढ़ती जा आरही है। एक के बाद एक जुमला, ढपोरशंखी वादा गुंजाया जा रहा है। घटते जनाधार और वोटों के भाटे की आशंका में राहतों के आभासीय ज्वार पैदा किये जा रहे हैं। इन दिनों शिवराज सिंह और उनकी सरकार का सबसे ज्यादा जोर रोजगार देने के लोकलुभावन एलानो पर है।  


🔴 अभी हाल में मुख्यमंत्री ने एक लाख भर्ती करने की घोषणा की है। बिना यह बताये कि इसी तरह के पिछले एलानो का क्या हश्र हुआ, बिना यह सूचित किये कि कितनी भर्ती के लिए कितनी परीक्षाएं, कितनी बार हुयी और कितने महीनो कितनी वर्षों से देश प्रदेश में उनके नतीजों का इन्तजार कितने लाख लोग कर रहे हैं। 

जैसे : 

🔺 2013 के विधान सभा चुनावों के पहले 24554 पदों के लिए भर्ती निकली थीं । 

🔺 2018 के विधान सभा चुनावों से पहले 39811 पदों पर वैकेंसी निकली और 

🔺 अब अभी तक 33990 पदों के लिए वैकेंसी की घोषणा हो चुकी है। 

🔺 पिछले दस साल से मध्यप्रदेश कर्मचारी शिक्षा चयन मंडल पर नजर डालें तो 1.70 लाख पदों के लिए 77 परीक्षायें हुई हैं। इनमें भी 34 हजार पदों की नियुक्तियां होना शेष है। 

🔺 अभी भी सारे रिक्त पदों पर भरने की बजाय जिन विभागों में 800 या इससे ज्यादा पद रिक्त हैं, वहां रिक्त पदों के 50 फीसद को ही भरने की योजना है। 


🔴 कुल मिलाकर सरकार रोजगार देने की बजाय इसे चुनावी घोषणा के तौर पर भुनाना चाहती है और कुछ अपने समर्थकों को रोजगार देकर प्रशासन पर पकड़ मजबूत करना चाहती है। इसके लिए एकमात्र शब्द फ्रॉड या धोखाधड़ी है।


🔴 आमतौर से मीडिया इस तरह की धोखाधड़ी की पड़ताल करता है - मगर इन दिनों के मीडिया से इस तरह की उम्मीद करना ही व्यर्थ है। मीडिया सहित सूचना के हर माध्यम पर जॉर्ज ऑरवेल का बिग ब्रदर खाकी नेकर पहने लाठी लिए बैठा है। वो कुछ भी कह सकता है, कुछ भी बोल सकता है, उसके कहे की समीक्षा नहीं की जा सकती। 


🔴 जिस देश में ईश्वर से प्रश्न किये जा सकते हैं उसमे इस बिग ब्रदर और उसके लगुओं-भगुओं ने जो कहा, जो किया उसको लेकर कोई सवाल जवाब नहीं किये जा सकते। सूचना और कम्युनिकेशन के हर माध्यम पर वर्चस्व कायम कर लिया गया है। सिर्फ अमावस की बात करनी है, उसकी भी सराहना ही करनी है। पूर्णिमा तो दूर रही - मोमबत्ती या दीपक जलाना भी अपराध है ; राष्ट्रद्रोह है।  


🔴 दूसरी जगह विधानसभा लोकसभा होती हैं, इनकी हालत क्या है यह बताने की जरूरत नहीं। यदि पुरानी भर्ती के रिकॉर्ड को फिलहाल के लिए भुला भी दें तो यदि ये भर्ती हो भी जाती हैं तब भी दो लाख से अधिक पद रिक्त रहने वाले हैं। दूसरा अनुभव यह है कि हर बार विधान सभा चुनावों से पहले सरकार नई भर्ती की घोषणा करती है।


🔴 बेरोजगारी की बाढ़ इस तरह के जुमलों के तिनकों से टलनी वाली नहीं है। पिछले दिसंबर में यह 16 महीनो के सबसे ऊंचे आंकड़े 8% तक पहुँच गयी थी - जबकि सामान्यतः यह समय रोजगारों में उभार का होता है। आने वाले दिनों में इसके कम होने की कोई भी संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती।  


🔴 केंद्र सरकार के बजट में बेरोजगारी की आग में पेट्रोल छिड़कने की पूरी व्यवस्था कर दी है। नए रोजगार सृजन के लिए कुछ भी खर्च बढ़ाने की बजाय इस बजट में मगनरेगा के आवंटन में 33 फीसद की कटौती कर दी गयी है। 


🔴 हुक्मरानो को यकीन है कि चुनाव आते आते तक वे साम्प्रदायिकता का शंख फूंककर ध्रुवीकरण का डमरू बजाकर पोलिंग बूथ्स पर लाइन में लगा देंगे। युवाओं और उनके अभिभावकों, बेरोजगारों और उनके परिजनों को शकुनि के इस दांव को समझना होगा - इसकी काट ढूंढनी होगी।

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